रविवार, 26 जून 2016

मूर्ति की नसीहत


एक सुंदर सुगंधित गुलाब के फूल ने पास पड़े एक पत्थर का मज़ाक उड़ाते हुए कहा-तुम्हारा शरीर कितना खुरदरा, बेजान और बेमतलब है? एक जगह पड़े रहते हो, आते-जाते लोगों के पांव की ठोकर खाते हो। पत्थर गुलाब की बात पड़े-पड़े सुनता रहा कुछ नहीं बोला। शाम को वही गुलाब का फूल मुरझा गया। कलियां उसे मुरझाते हुए देख रोने लगीं। उसी शाम एक मूर्तिकार की नज़र उस पत्थर पर पड़ी। उस मूर्तिकार ने छैनी हथोड़े के सहयोग से तराश कर उसमें से एक मनभावन सुंदर भगवान की मूर्ति को प्रकट किया। वह मूर्ति मंदिर में प्रतिष्ठित हुई। उसकी पूजा अर्चना होने लगी। वे कलियां जो अब फूल बन चुकीं थीं, उस मूर्ति के चरणों में अर्पित कर दी गई। फूलों को अपने चरणों में अर्पित किए जाने पर वह पत्थर हंसा। कलियां पत्थर की हंसी को समझ नहीं पार्इं, बड़ी लज्जा के साथ उन्होंने पूछा कि आप हम पर क्यों हंस रह हो? मूर्ति बने पत्थर ने बड़े धैर्य से कहा-बहनो! कृपा कर अपनी संतानों को इस बात से अवगत करा देना कि कोई फूल किसी पत्थर का मखौल नहीं उड़ाए। न उसे घृणा की नज़र से देखे। कौन जाने किसके भाग्य में क्या लिखा है? मूर्ति की बात सुनकर कलियां समझ गर्इं कि किसी का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए क्योंकि कल तक जो पत्थर लोगों के पांवों की ठोकरें खा रहा था आज उसी के चरणों में हज़ारों लोग सिर झुका रहे हैं।


शुक्रवार, 24 जून 2016

दान का महत्व

एक बार की बात है किसी देश के राजा की कथा है जो कि बड़ा दानी था| लेकिन उसका नियम था कि वह केवल एक निश्चित समय पर दान दिया करता था| उसके बाद वह किसी को दान नहीं देता था| एक दिन उस राजा के पास एक सन्त जी आये जिनका नियम था कि वे केवल एक ही घर में भीक्षा के लिए जाते थे जो कुछ मिलता था उसी से गुजारा करते थे और जहाँ वे जाते कुछ न कुछ थोडा या ज्यादा जरुर लाते थे| अब सन्त जी ने राजा से भीक्षा मांगी लेकिन राजा का दान का जो निश्चित समय था वह ख़त्म हो चुका था| राजा ने सन्त जी को कहा कि अब मैं तुम्हे भीक्षा नहीं दे सकता| क्योंकि मेरा यह नियम है कि निश्चित समय पर ही दान देता हूँ| तब सन्त जी ने कहा कि मेरा भी यह नियम है कि मैं भी एक घर से भीक्षा लेता हूँ तो आज तो मैं भीक्षा लेकर ही जाऊँगा| तो राजा को क्रोध आ गया उसने क्या किया उसके पास घोड़े की लिद पड़ी थी राजा ने वह उठाकर सन्त जी की झोली में डाल दी| सन्त जी तो पहले ही बड़े सरल स्वभाव के थे उन्होंने राजा को कुछ नहीं कहा और झोली में लिद को लिए वापिस चल दिये| रास्ते में भगवान को धन्यवाद कर रहे कि शुक्र है भगवान तेरा| कि आज तेरी कृपा से मेरा नियम नहीं टूटा| उन्होंने अपने आश्रम के बाहर उस लिद को गिरा दिया| कुछ दिनों बाद राजा अपने सैनिको के साथ वन की तरफ जा रहा था तो रस्ते में वह क्या देखता है कि एक जगह पर बड़े-बड़े लिद के ढेर जमा हो रखे है| राजा यह देखकर हैरान कि यहाँ तो आसपास कोई घोड़ो का अस्तबल नजर नहीं आता फिर ये लिद के ढेर कहां से आ गये| तब उसने अपने सैनिको को भेजा कि जाओ पता करके आओ| तो सैनिक जाते है तो वही पास में एक झोपडी थी| जिसमे सन्त जी रहते है| जो राजा के यहाँ से लिद को झोली में लेकर आये थे| अब सैनिको ने क्या किया वे झोपडी में गये और वहाँ बैठे सन्त जी से पूछा- कि ये लिद के ढेर कैसे लगे है| तो सन्त जी ने जवाब दिया कि अपने राजा से जाकर कहो कि ये वही लिद है जो राजा ने मेरी झोली में डाली थी| अब वह बढती-बढती इतनी ज्यादा हो गई है| तो यह तो राजा को खानी पड़ेगी| अब सैनिक यह सुनकर घबराते हुए कि कहीं राजा उन्हें जान से ना मार दे यह बात सुनकर वह राजा के पास गये और राजा को सारा वृतान्त सुनाया| अब राजा भी काफी घबरा गया| वह सन्त जी के पास गया और माफ़ी मांगने लगा| तो सन्त जी ने कहा- कि यह लिद तो राजा जी आपको खानी ही पड़ेगी| ये आपके द्वारा किया गया पाप है| आपने जो लिद मेरी झोली में डाली थी वह पाप बढ़ता गया और यहाँ लिद के ढेर इकट्ठे हो गये| तब राजा ने अपने बुरे काम की श्रमा मांगी और उस लिद को खत्म करने का उपाए पूछा| तो सन्त जी ने कहा कि नहीं राजा जी यह लिद तो आपको खानी पड़ेगी| तब राजा ने घबराते हुए उत्तर दिया- कि इतनी लिद तो सात जन्म भी बीत जाये तभी भी खाते-खाते खत्म न होगी| मैं आपसे दोबारा माफ़ी माँगता हूँ कृपा करके इस लिद को ख़त्म करने का उपाए बताइये| तब सन्त जी ने दया कर राजा को इसका उपाय बताया कि राजा तुम अब अपने राज्य में जाकर अपनी बुराइयाँ, अपनी निन्दा करवाओ| उस निन्दा से तुम्हारे बुरे कर्म कट जायेंगे और यह लिद कम हो जायेगी| राजा ने ऐसा ही किया उसने राज्य में जाकर लोगो पर कर लगाना शुरू कर दिया| अत्याचार शुरू कर दिया जिससे कि पूरे राज्य में साथ-साथ दूसरे राज्यों में भी राजा की निन्दा होने लगी| कुछ समय बाद जब राजा फिर से सन्त जी के पास गया तो उनके द्वारा बताये रास्ते पर चलने से वह लिद के ढेर खत्म हो गए थे| लेकिन वहीं थोड़ी सी लिद जो सन्त जी झोली मे लाये थे वह पड़ी थी| तो राजा ने सन्त जी से पूछा कि यह लिद तो खत्म नहीं हुई तो सन्त जी ने कहा कि यह तो तुम्हे खानी ही पड़ेगी| क्योंकि वह लिद जो खत्म हो गई वो तो तुम्हारे द्वारा किये गए पापो का व्याज था जो कि निन्दा करवाने से ख़त्म हो गया लेकिन यह तो असल पाप है जिसका दण्ड तो तुम्हे भुगतना ही होगा| तो कहने का मतलब यही है कि कभी कोई ऐसा काम न करो कि हमारे पाप प्रकाशित होकर बढ़ते जाये और उसका दण्ड हमें बहुत ज्यादा भुगतना पड़े| उदाहरणतः यदि हम किसी को गलत बात कह देते है और जिससे दूसरे का दिल दुख जाता है तो वह जब-जब उस बात को याद करेगा तो उसकी आत्मा दुखेगी तो पाप तो हमारा ही बढ़ता जायेगा| तो मतलब यही है कि हमेशा ऐसा कर्म करो जो कि दूसरो के लिए हितकारी हो||

बुधवार, 22 जून 2016

19.06.2016

एक औरत अपने घर से निकली, उसने घर के सामने सफ़ेद लम्बी दाढ़ी में तीन साधू-महात्माओं को बैठे देखा। वह उन्हें पहचान नही पायी।
उसने कहा, ” मैं आप लोगों को नहीं पहचानती, बताइए क्या काम है ?”
” हमें भोजन करना है।”, साधुओं ने बोला।
” ठीक है ! कृपया मेरे घर में पधारिये और भोजन ग्रहण कीजिये।”
” क्या तुम्हारा पति घर में है ?”, एक साधू ने प्रश्न किया।
“नहीं, वह कुछ देर के लिए बाहर गए हैं।” औरत ने उत्तर दिया।
“तब हम अन्दर नहीं आ सकते “, तीनो एक साथ बोले।
थोड़ी देर में पति घर वापस आ गया, उसे साधुओं के बारे में पता चला तो उसने तुरंत अपनी पत्नी से उन्हें पुन: आमंत्रित करने के लिए कहा। औरत ने ऐसा ही किया, वह साधुओं के समक्ष गयी और बोली,” जी, अब मेरे पति वापस आ गए हैं, कृपया आप लोग घर में प्रवेश करिए!”
” हम किसी घर में एक साथ प्रवेश नहीं करते।” साधुओं ने स्त्री को बताया।
” ऐसा क्यों है ?” औरत ने अचरज से पूछा।
जवाब में मध्य में खड़े साधू ने बोला,” पुत्री मेरी दायीं तरफ खड़े साधू का नाम ‘धन’ और बायीं तरफ खड़े साधू का नाम ‘सफलता’ है, और मेरा नाम ‘प्रेम’ है। अब जाओ और अपने पति से विचार-विमर्श कर के बताओ की तुम हम तीनो में से किसे बुलाना चाहती हो।”
औरत अन्दर गयी और अपने पति से सारी बात बता दी। पति बेहद खुश हो गया। “वाह, आनंद आ गया, चलो जल्दी से ‘धन’ को बुला लेते हैं, उसके आने से हमारा घर धन-दौलत से भर जाएगा, और फिर कभी पैसों की कमी नहीं होगी।”
औरत बोली,” क्यों न हम सफलता को बुला लें, उसके आने से हम जो करेंगे वो सही होगा, और हम देखते-देखते धन-दौलत के मालिक भी बन जायेंगे।”
“हम्म, तुम्हारी बात भी सही है, पर इसमें मेहनत  करनी पड़ेगी, मुझे तो लगता ही धन को ही बुला लेते हैं।”, पति बोला।
थोड़ी देर उनकी बहस चलती रही पर वो किसी निश्चय पर नहीं पहुच पाए, और अंतत: निश्चय किया कि  वह साधुओं से यह कहेंगे कि धन और सफलता में जो आना चाहे आ जाये।
औरत झट से बाहर गयी और उसने यह आग्रह साधुओं के सामने दोहरा दिया।
उसकी बात सुनकर साधुओं ने एक दूसरे  की तरफ देखा और बिना कुछ कहे घर से दूर जाने लगे।
” अरे ! आप लोग इस तरह वापस क्यों जा रहे हैं ?”, औरत ने उन्हें रोकते हुए पूछा।
” पुत्री, दरअसल हम तीनो साधू इसी तरह द्वार-द्वार जाते हैं, और हर घर में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं, जो व्यक्ति लालच में आकर धन या सफलता को बुलाता है हम वहां से लौट जाते हैं, और जो अपने घर  में प्रेम का वास चाहता है उसके यहाँ बारी- बारी से हम दोनों भी प्रवेश कर जाते हैं। इसलिए इतना याद रखना कि जहाँ प्रेम है वहां धन और सफलता की कमी नहीं होती।”, ऐसा कहते हुए धन और सफलता नामक साधुओं ने अपनी बात पूर्ण की।

सोमवार, 20 जून 2016

सम्यक जीवन

मोटा अर्थ है कि व्यायाम उतना करें जो सम्यक हो संतुलित हो। सूक्ष्म अर्थ भी है। इसका गहरा अर्थ है कि आप जो भी श्रम करें चाहे मानसिक तल पर चाहे शारीरिक तल पर वो हमेशा सम्यक हो वो कभी अति पर न चला जाये। वो अति पर चला जायेगा घातक हो जायेगा।
     बुद्ध के पास श्रोण नाम को एक राजकुमार दीक्षित हुआ था। वो वैभव में पला उसने कभी कोई दुःख नहीं देखे कभी नंगे पैर सड़क पर नही चला। वो भिखारी हो गया उसको अब चिथड़े पहनने पड़े और नंगे पांव चलना पड़ा। लेकिन बुद्ध देखकर हैरान हुये कि और भिक्षु तो ठीक रास्ते पर चलते हैं वो उन पगडन्डियों पर चलता है जहाँ काँटे हों उन पर जानबूझकर चलता है। और जब उसके पैरों से खून बहने लगता है और फफोले होने लगते हैं उसमें गौरव अनुभव करता है इसको वो तपश्चर्या समझ रहा है। इसको वो त्याग समझ रहा है। बड़ा सुन्दर था गौर वर्ण था। तीन महीने में वो सूखकर हड्डी हो गया। एक दम काला पड़ गया। बुद्ध ने एक दिन उसके पास जाकर कहा, एक बात पूछनी है। मैने सुना कि जब तुम राजकुमार थे तुम बीणा बजाने में बहुत कुशल थे। तो मैं ये पूछने आया हूँ अगर बीणा के तार बहुत ढीले हों तो संगीत पैदा होता है? तो उसने कहा तार बहुत ढीले हों तो संगीत कैसे पैदा होगा? ध्वनित ही नहीं होगा। बुद्ध ने कहा, तार अगर बहुत कसे हों तो संगीत पैदा होता है? तो उसने कहा, तार बहुत ज़्यादा कसे हों तो वो टूट जायेंगे। तब भी ध्वनित नहीं होगा। बुद्ध ने कहा, मैं तुमसे ये कहने आया हूँ, कि जो वीणा का नियम है वही जीवन का नियम है। तार बहुत ढीले हों तो बेकार हैं तार बहुत कसे हों तो बेकार हो जायेंगे। तारों की एक स्थिति ऐसी है कि जो न ढीले हैं और न कसे हुये हैं वही स्थिति जिन्हें आप न ढीले कह सको न कसे कह सको तभी उनमें संगीत पैदा होता है। और जीवन में भी वहीं संगीत पैदा होता है जहाँ संतुलन होता है। जहाँ इस तरफ या उस तरफ किसी अति पर नहीं होता है। एक आदमी अतिशय भोजन करता है फिर उपवास भी करता है। ये दोनों बातें पागलपन की है। न तो निराहार होना है न अति आहार करना है। सम्यक आहार लेना है।

शुक्रवार, 17 जून 2016

कहीं दूर भागने के प्रश्न नहीं है। अपने को परिवर्तन करने का है।


एक साधु था, और बादशाह उससे बहुत प्रेम करता था उसका आदर करता था। एक दिन बादशाह ने कहा, आप मेरे महल में आ जायें तो बड़ी कृपा होगी। वहीं रहें। मुझसे नहीं देखा जाता कि आप इस झोंपड़े में रहें और इस दरख्त की नीचे पड़े रहें। उस साधु ने कहा, तुम्हारी मर्ज़ी, हम यहाँ सोते थे वहाँ सो जायेंगे। बादशाह जब उसे रथ में लेकर लौटने लगा। रास्ते में उसे सन्देह हुआ,अगर वो सच  में फकीर था, अगर सचमुच में ही साधू है तो कैसा साधु है, महल में जाने के लिये तैयार हो गया। उसे तो इन्कार करना चाहिये थे कि मैने लात मार दी राजमहल को। तो बादशाह समझता कि हाँ कोई साधु है। बादशाह को शक हो गया। उसने रथ पर बैठने से भी इन्कार नहीं किया, वो मज़े से गद्दी पर बैठ गया। वो राजमहल में जाने को राज़ी हो गया उसने एक बार भी नहीं कहा, कि नहीं मैं राजमहल नहीं जा सकता। बादशाह को लगा कि ज़रुर कुछ गड़बड़ है। साधु पूरा नहीं मालूम होता। लेकिन चूँकि अब खुद ही उसको लाया था , उसे ले गया। उसे बढ़िया से बढ़िया भवन में ठहराया वो ठहर गया। अच्छे अच्छे भोजन दिये उसने खाये। राजा तो बहुत हैरान हुआ वो समझा कि हम तो गल्त आदमी को ले आये। सारा आदर चला गया। ये काहे का साधु है? उसे बहुत बढ़िया बिस्तर पर सुलाया वो मज़े से सोया। थोड़े ही दिन में राजा को बहुत सन्देह पकड़ने लगा, श्रद्धा सारी खण्डित हो गई। क्योंकि श्रद्धा उस साधु पर थोड़ी थी, श्रद्धा तो उस दरख्त पर थी, उस झोंपड़े पर थी, श्रद्धा तो उस भूखे मरते आदमी पर थी, श्रद्धा तोउस भीख माँगने में थी, उस साधु पर थोड़ा थी, अब न भीख माँगता है, न दरख्त के नीचे है, न नंगा है न उघाड़ा है। अब काहे पर श्रद्धा होने वाली थी। आपने भी अभी श्रद्धा की होगी शायद ही किसी साधु पर की होगी। आपने कम कपड़े पर श्रद्धा की होगी, भूखे आदमी पर श्रद्धा की होगी, उघाड़े नंगे आदमी पर श्रद्घा की होगी। घर द्वार छोड़े हुये पर श्रद्धा की होगी। साधु को तो आप जाने भी नहीं होंगे। वो बादशाह एक दिन सुबह सुबह उस साधु के पास आया, वो बोला, क्षमा करें, एक सन्देह मुझको बड़ा हैरान किये दे रहा है, जब तक आप मेरे महल में नहीं आये थे, मैं आपके प्रति एक आदर अनुभव करता था, जब से आ गये हैं, मैं इतनी हैरानी में हूँ, मेरे सन्देह का निवारण कर दें। मेरी रातों की नींद मुश्किल हो गई है। राजा ने केहा, जब आप आये हैं, मुझे ख्याल पकड़ता है कि मुझमें और आप में कुछ भेद नहीं है। अब निश्चित ही हो गया है जैसा मैं रहता हूँ आप भी वैसे ही रहते हैं, जैसा मैं सोता हूँ आप सोते हैं, जैसा मैं खाता हूँ आप खाते हैं, तो मुझमें आप में भेद क्या है? उस साधु ने कहा, भेद अगर जानना ही चाहते हैं, तो थोड़ा गाँव के बाहर चलना होगा। वो बोला मैं जानना ही चाहता हूँ, गाँव के बाहर भी चलूँगा। वे दोनों सुबह सुबह उठे गाँव के बाहर गये जब नदी के पार गाँव की रेखा समाप्त हो गई , उस राजा ने कहा, अब बता दें। साधु बाला थोड़ा और आगे चलें तो बताऊँ, ये भी हो सकता है आगे चलने से उत्तर भी मिल जाये। राजा कुछ समझा नहीं, वे कुछ और आगे गये, राजा ने फिर कहा, साधु ने कहा, थोड़ा और आगे चलें दोपहर होने लगी, राजा ने कहा, बहुत देर हो गई अब उत्तर दे दें, साधु ने कहा, उत्तर मेरा ये है मैं तो अब आगे जाता हूँ, आप भी चलते हैं? राजा बोला, मैं कैसे जा सकता हूँ? मेरा राज्य है, मेरा महल है, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरी प्रजा है, वो सब कुछ पीछे है। वो फकीर बोला, मेरा पीछे कुछ भी नहीं है, मैं तो जाता हूँ, तुम्हारे महल में ज़रुर था, तुम्हे भ्रम हो गया कि मेरे भीतर तुम्हारा महल होगा। मैं तुम्हारे महल में था, इससे तुम्हें भ्रम हो गया तुम्हारा महल मेरे भीतर होगा, तुम्हारे महल में ज़रुर रहा था, तुम्हारे महल को अपने भीतर नहीं लिया है। मैं जाता हूँ, बादशाह ने पैर पकड़े और कहा, मुझे बोध हो गया, मुझे दुःख होगा, वापिस चलें। वो साधु बोला वापिस तो अभी चलूँ, लेकिन तुम्हें फिर सन्देह पकड़ लेगा, इसलिये नहीं मैं पीछे जाने से रुक रहा हूँ कि मुझे कोई दिक्कत है, क्योंकि जिसे झोंपड़े में और महल में फर्क है वो अभी साधु नहीं है, उसने कहा, मैं तो अभी चलूँ, लेकिन दिक्कत हो जायेगी। तुम्हें फिर सन्देह पकड़ लेगा, तुम्हे सन्देह न पकड़े इसलिये मुझे जाने दो।
      आत्मज्ञान के पूर्व अमोह नहीं हो सकता। आप भी समझते हैं कि हम घर गृहस्थी में रहेंगे और मोह नहीं रखेंगे, आसक्ति नहीं रखेंगे, हमें जल में कमल वत रहने दें।  तो आप गल्ती में है। ये आपकी दलील झूठी है। ये दलील केवल न कुछ करने की है। ये दलील केवल गृहस्थी में बने रहने की है। ये आत्म प्रवंचना है। असम्भव है कि आप वहाँ रहकर मोह नहीं करेंगे।  जब तक आत्म ज्ञान नहीं हो जाता तब तक आसक्ति से मुक्त नहीं हुआ जा सकता। मोह तो तभी जा सकता है जब थोड़ी सी भी आत्मिक झलकें उपलब्ध हो जायें। मोह तो इसलिये है कि मैं जानता हूँ कि मैं देह हूँ इसलिये दूसरे की देह पर आकर्षण है। इसलिये दूसरे की देह से मोह है। जब तक मैं जानता हूँ मैं देह हूँ, तब तक धन से मोह होगा। जब तक मैं जानता हूँ मैं देह हूँ मकान से मोह होगा। ये मेरा देह होना ही ,मेरा मकान के प्रति, मेरा धन के प्रति, परिवार के प्रति, दूसरे की देह के प्रति, आसक्ति होगी, मोह होता है। जब तक मैं जानता हूँ, कि मैं पदार्थ हूँ तब तक मेरा पदार्थ से मोह विलीन नहीं हो सकता। जिस दिन मैं जानूँगा मैं पदार्थ नहीं चैतन्य हूँ उस दिन मेरा संसार से मोह विलीन हो जायेगा।

बुधवार, 15 जून 2016

ये सब कहां जा रहे हैं


     आज किसी नगर में जाइये, किसी भी कस्बे में जाइये, जहां भी जाइये, प्रत्येक व्यक्ति आवश्यकता से अधिक व्यस्त नज़र आता है। प्रातःकाल के समय देखिये तो सभी को जाने की जल्दी है। इसलिये कोई बस पकड़ने को भाग रहा है, कोई स्कूटर पर भागा चला जा रहा है और कोई तेज़ी से साइकिल पर। सभी को जल्दी है।
     एक बार एक नगर में एक साधु ने आठ दस व्यक्तियों को रुकने का संकेत किया, परन्तु किसी के पास भी इतना अवकाश न था कि रुक कर उसकी बात सुने।अन्ततः एक साइकिल सवार उसके संकेत पर रुका, शायद यह समझ कर कि वह इस नगर से अपरिचित है और कोई पता आदि पूछना चाहता है। पूछा तो साधू ने उससे अवश्य, परन्तु पूछा कुछ और ही। साधू तथा उस व्यक्ति के मध्य जो वार्तालाप हुआ, वह इस प्रकार था।
साधु-मैं जिधर दृष्टि डालता हूँ यही देखने में आता है कि सब जल्दी में हैं।किसी को बात सुनने की भी फुर्सत नहीं।यह सब भागदौड़ किसलिये? साधु की बात सुनकर वह व्यक्ति मुस्कराया और बोला बाबा! ये सभी
लोग काम पर जा रहे हैं।
साधु-काम पर?
व्यक्ति- जी हाँ! इनमें से कोई सरकारी कार्यालय में नौकर है, कोई प्राईवेट फर्म में कोई दुकानदार है तो कोई अध्यापक, कोई डाक्टर है तो कोई इंजीनियर-सभी को समय पर काम पर पहुँचना है, इसीलिये जल्दी में हैं।
साधु-काम किसलिये?
व्यक्ति-पैसा कमाने के लिये और किसलिये?
साधु-पैसा किसलिए?
व्यक्ति-खान-पान-पहरान के लिये।
साधु-खान-पान-पहरान किसलिये?
व्यक्ति-जीवन के लिए। जीवन के लिये ये सब कुछ तो चाहिए ही।
साधु-यह तो ठीक है, परन्तु जीवन किसलिए है?
     यह प्रश्न सुनकर उस व्यक्ति ने साधु की ओर ध्यान से देखा और साइकिल पर सवार होकर चल दिया। इस प्रश्न का शायद उसके पास कोई उत्तर नहीं था। उसके पास ही क्या, शायद किसी भी आम संसारी मनुष्य के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है,क्योंकि आम संसारियों को इस बात का पता ही नहीं है कि यह जीवन किसलिए है? वह कौन सा वास्तविक कार्य है जिसके लिए यह जीवन,जिसे सब योनियों से श्रेष्ठ कहा गया है,उन्हें मिला है?इस वास्तविकता का पता तो सन्तों महापुरुषों की संगति में आने पर ही चलता है कि यह श्रेष्ठ जीवन केवल खाने पीने पहनने के लिए नहीं,प्रत्युत परमात्मा की भजन भक्ति के लिए मिलाहै। खाना पीना आदि जीवन को स्थिर रखने के लिए आवश्यक है,इसमें कोई सन्देह नहीं,परन्तु जीवन खाने पीने के लिए नहीं है,वह भजन भक्ति के लिए है। मनुष्य को चाहिए कि जीवन में वास्तविक कार्य परमात्मा की भजन भक्ति करके अपना जीवन सफल करे।