शुक्रवार, 25 मार्च 2016

मकान गिरा फिर भी प्रसन्न


     मैं छोटा था, और मेरे पिता गरीब थे। उन्होने बड़ी मुश्किल से एक अपना मकान बनाया। गरीब भी थे और ना-समझ भी थे, क्योंकि कभी उन्होंने मकान नहीं बनाये थे।उन्होंने बड़ी मुश्किल सेएक मकान बनाया। वह मकान ना-समझी से बना होगा। वह बना और हम उस मकान में पहुँचे भी नहीं और वह पहली ही बरसात में गिर गया। हम छोटे थे और बहुत दुःखी हुए।वे गांव के बाहर थे।उनको मैने खबर की कि मकान तो गिर गया और बड़ी आशायें थीं कि उसमें जायेंगे। वे तो सब धूमिल हो गयीं। वे आये और उन्होने गाँव में प्रसाद बाँटा और उन्होने कहा, कि परमात्मा का धन्यवाद।अगरआठ दिन बाद गिरता तो मेरा एक भी बच्चा नहीं बचता।हमआठ दिन बाद ही उस घर में जाने को थे।और वह उसके बाद ज़िन्दगी भर इस बात से खुश रहे कि मकान आठ दिन पहले गिर गया। आठ दिन बाद गिरता तो बहुत मुश्किल  हो जाती। यूँ भी ज़िन्दगी देखी जा सकती है। और जो ऐसे देखता है,उसके जीवन में बड़ी प्रसन्नता का उद्भव होता है। आप ज़िन्दगी को कैसे दखते हैं इस पर सब निर्भर है। हम इतने प्रसन्न हों कि हम मौत को और दुःख को गलत कर दें। जो
इतनी प्रफुल्लता और आनंद को अपने भीतर संजोता है, वह साधना में गति करता है। साधना की गति के लिए यह बहुत ज़रूरी है।

बुधवार, 23 मार्च 2016

मन कुंचर काया उद्यानै। गुरु आंकुस सच सबद पछानै।।


        
युनान के राजा फिलिप्स के पास किसी ने उपहार के रूप में एक अश्व भेजा, जो बड़ा ही मुँहजोर था। कोई भी सवार उसे न तो काबू में ला सकता था,न ही उस पर सवारी करने में सफल हो सकता था। शाह फिलिप्स ने बड़ा प्रयत्न किया कि किसी प्रकार वह घोड़ा काबू में लाया जावे। बड़े बड़े घुड़सवारऔर अश्वविद्या के ज्ञाता भी हार गये,किन्तु वह किसी के भी किसी तरह काबू में न आ सका। देखने में यह एक अति सुन्दर जानवर था,तथा सब प्रकार से स्वस्थ पुष्ट और स्वारी के योग्य मालूम होता था,किन्तु यह किसी की समझ में नहीं आता था कि इसमें क्या औगुण है, जिससे यह किसी के काबू में नहीं आता। कोशिश करने पर भी जब कोई उसके औगुण को न पा सका,तो हारकर शाह फिलिप्स ने उस घोड़े को वापिस भेज देने का निश्चय किया।यह बात फिलिप्स के पुत्र सिकन्दर को मालूम हुई,तो उसे बहुत दुःख हुआ। उसने अपने पिता से प्रार्थना की,""यह घोड़ा मुझे दे दिया जावे,मैं इसे काबू में लाने का यत्न करूँगा।'' पिता ने बहुत कुछ समझाया बुझाया कि,""बेटा!जिस घोड़े पर काबू पाने में बड़ेबड़े चतुर सवार भीअसफल रहे हैं,तू उसे क्योंकर काबू में ला सकेगा?तू तो अभी अल्पायु है,यह तेरे बस का काम नहीं।''किन्तु सिकन्दर न माना। उसने उत्तर दिया,""पिता जी!कोशिश और हिम्मत करने से कौन सा कठिन से कठिन कार्य पूरा नहीं किया जा सकता?
     इस पर सिकन्दर के पिता ने आज्ञा दे दी। सिकन्दर ने घोड़े की बाग थामी और उसे लेकर काफी देर तक इधर-उधर घुमाता रहा।इसप्रकार करने से उसने घोड़े काऔगुण खोज लिया कि यहअपनी ही छाया से डरता और बिदकता है।अब सिकन्दर ने घोड़े का रुख सूर्य की ओर कर दिया।ऐसा करने से घोड़े की छाया पीछे कीओर चली गईऔर घोड़ा बराबर आगे की तरफ बिना झिझके बिदके चलता गया। अब सिकन्दर उचककर उसकी गर्दन पर सवार हो बैठा। घोड़े ने कोई अड़चन पैदा न की। सिकन्दर ने घोड़े को एड़ी लगाई, तो वह वायु से बातें करने लगा। अब उसकी परछार्इं पीछे की ओर रहने से घोड़ा ज़रा भी न बिदका। सिकन्दर ने उसे खूब दौड़ाया यहाँ तक कि घोड़ा पूरी तरह थक गयाऔर अपनी मस्ती तथा उद्दण्डता खो बैठा।अब सिकन्दर पूरी तरह सेअश्व की शक्ति का स्वामी बन गया था। फिर सिकन्दर ने उसे उलटे रुख में चलाया। पहिले तो घोड़ा बिदका और घबराया,किन्तु अब चूँकि सिकन्दर उसकी शक्तिपर काबू पा चुका था,इसलिये घोड़ा विवश होकर रह गया। अब उसे अपनी छाया की ओर भी चलना पड़ा। इस प्रकार करने से धीरे धीरे उसकी अपनी छाया से डरने वाली आदत जाती रही और वह पूरी तरह से सिकन्दर के काबू में आ गया।
     यह तो एक दृष्टान्त हुआ। ठीक इसी प्रकार ही मन रूपी घोड़े का भी हाल समझना चाहिये। चूँकि यह मन माया के मिसाले से बना हुआ है, यह सब माया अपनी ही छाया है। वास्तव में यह अपना ही प्रतिबिम्ब है। माया में चन्चलता है,इसीलिये यह मन रुपी घोड़ा भी अपनी छाया से आप ही चन्चल हो उठता है और इन्द्रियों के विषयों की वासनाओं के कारण सदा बैचैन बना रहता है। विषय-वासनाओं की तरफ दौड़ता हुआ यह मन आप ही अपना शत्रु बनकर अपनेआप से घृणा करने लगता है। किन्तु जब इस मन रूपी घोड़े के मुख में सतगुरु के शब्द रूपी लगाम दी जावेऔर बुद्धि रूपी सिकन्दर ज्ञानरूपी काठी पर चढ़कर सवार होवे, तथा शान्तिऔर धैर्य के रिकाबों में पाँव रखे,वैराग्य का चाबुक लगावे, और इस घोड़े को सतगुरु रूप सूर्य के सम्मुख रखकर भक्तिमार्ग पर दौड़ावे-तब यह मन रूपी घोड़ा अपने आप थक कर स्थिर हो जावेगा। और संसार की प्रकृति रूपी छाया का भय अपने आप ही जाता रहेगा। जिस प्रकार कि परमसन्त श्री कबीर साहिब जी फरमाते हैंः-
         मन चेतन ताज़ी करै, लव  की  करै लगाम।।
         शब्द गुरु का ताज़ना कोई पहुँचै सन्त सुठाम।।
         छिन छिन मन गुरु चरणन लावै एक पलक छुटन नहीं पावै।।
अर्थात मन को गुरु-शब्द द्वारा वश में करके कुमार्ग में जाने से रोके। तथा जहाँ जहाँ मन भटकता है,वहाँ वहाँ इसको गुरु के ध्यान में लगावे। इस प्रकार करते रहने यह मन स्थित और शान्त हो जावेगा और इसकी कल्पना आप से आप मिटती जावेगी।

मंगलवार, 22 मार्च 2016

शिकारी आयेगा जाल बिछायेगा


कहते हैं कि एक बार किसी महात्मा का एक बाग में स्वाभाविक जाना हुआ। देखा कि वृक्षों पर कुछ सुन्दर सुन्दर तोते कलोल कर रहे हैं। सोचने लगे कि कितने कमनीय हैं ये तोते। फिर विचार आया कि कहीं ये किसी शिकारी के जाल में चोग के लालच में आकर फँस न जावें। इस विचार से उन्होने एक तोते को पकड़ा और अपने आश्रम पर ले आये।उसे यह पाठ पढ़ाना आरम्भ किया,""शिकारीआएगा,जाल बिछाएगा, दाना डालेगा हमको फँसायेगा परन्तु हम नहीं फँसेंगे।''जब कुछ दिन निरन्तर पढ़ाने के पीछे तोते ने वे शब्द रट लिये तो महात्मा जी ने जाकर उस तोते को बाग में दूसरे तोतों के बीच में छोड़ दिया। ज्यों ही उस तोते ने अपने साथियो में जाकर महात्मा की पढ़ाई हुई शिक्षा बोलनी शुरु की-दूसरे तोते भी उसकी नकल कर वे ही शब्द बोलने लगे-""शिकारी आयेगा, जाल बिछायेगा, दाना डालेगा, हमको फँसाएगा।परन्तु हम नहीं फँसेंगे।''पहले वह पढ़ा हुआ तोता शब्द बोलता और दूसरे तोते उसकाअनुकरण करते।भाव यह कि वहाँ एक प्रकार की पाठशाला खुल गई।जैसे अध्यापक बच्चों को पढ़ाता है इसी प्रकार वह तोता दूसरे तोतों को पढ़ाने लगा। उन तोतों को भी वे शब्द भलीभाँति कण्ठस्थ हो गये। महात्मी जी ने समझ लिया कि अब ये तोते किसी तरह भी शिकारी के जाल में नहीं आ सकते।
     संयोगवश एक शिकारी उस बाग में आ गया।उसकी दृष्टि बाग के तोतों पर पड़ी उसे उन्हें पकड़ने की चाह हुई। किन्तु जब उनके मुख से उठती हुई उस ध्वनि को सुना, तो वह अचकचा गया और सोचने लगा कि ये तोते तो किसी अध्यापक के पढ़ाये हुए हैं ये क्योंकर मेरे पाश में आ सकेंगे।अच्छा,प्रयत्न तो करता हूँ।उसने जाल बिछाकर चोग डाल दी।तोतों ने सामने पड़ी हुई चोग देखी और लालच के मारे जाल पर आ बैठे। फल यह हुआ कि वे जाल में फँसते भी जा रहे हैंऔर वे शब्द भी बोले जाते हैं। शिकारी जाल समेट कर प्रसन्न हुआ हुआ घर को चल दिया। वहां उन्हें उसने पिंजरों में डाल दिया। दो एक दिन के बाद उन्हें बाज़ार में बेचने के लिये चला। आश्चर्य तो यह है कि वे तोते पिंजड़ों में बैठे हुए-बाज़ार में बिक रहे हैं परन्तु मुख से उसी शब्द को दोहराए जा रहे हैं कि,""शिकारी आएगा,जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, हमें फँसाएगा किन्तु हम नहीं फँसेंगे।
     यही दशा प्रायः संसारियों की है। ये तोते क्या हैं? ये संसारी जीव हैं।इस जगत रूपी बाग में आ जाते हैं। काल रुपी शिकारी ने इस बाग में आकर संसारी जीवों को फँसाने के हेतु विलासिता की सामग्री बखेर दी है। तोतों की भाँति संसारी जीव दाने के लोभ में शिकारी के जाल में उतर आते हैं। उन्हें दाना तो नज़र आता है परन्तु माया का जाल और काल-शिकारी नज़र नहीं आते।प्रायः संसारी जीव सुनतेऔर पढ़ते हैं किमोह-माया बन्धन रुप है,काल रुपी शिकारी है-हम मोह-माया के बन्धन में फँसकर कालरूपी शिकारी के हवाले हो रहे हैं।जहाँ कि जीवात्मा को अनेक योनियों में आवागमन के चक्कर काटने पड़ते हैं। जितने भी धर्म ग्रन्थ हैं उन सबमें प्रभु की विशेषताएं लिखी हुई हैं। वे अपने प्रकाश की ओर ले जाते हैं,सुमार्ग दिखलाते हैं किन्तु वे स्वयं प्रकाश नहीं है। उनके पढ़ लेने मात्र से,और ऊँचे स्वर में पाठ कर लेने से,मन का अऩ्धकार दूर नहीं हो सकता। मन का अन्धेरा तभी दूर होगा जब हम धर्मग्रन्थों के बताये हुए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को आचरणमय बनायेंगे। एक बार क्याअनेक बार भी ग्रंथों का पाठ किया जाये परन्तु लक्ष्य की प्राप्ति तभी होगी जब उनके दर्शाये हुए मार्ग पर आचरण किया जायेगा।

रविवार, 20 मार्च 2016

रब्ब दा पाइयाई बड्डा है


बाबा फरीद की माँ ने कहा बेटा घर में शक्कर नहीं है। बाज़ार से शक्कर ले आ। बाबा फरीद जी ने पूछा, माँ कितनी शक्कर ले आऊँ? माँ ने कहा, एक पाव ही काफी है। एक पाव शक्कर ले आ। बाबा फरीद परमात्मा के ध्यान में ऐसे बैठे कि शक्कर लाना ही भूल गये। और सारी रात बैठे ही रह गये। माँ ने भी उन्हें ध्यान से उठाना उचित न समझा और दरवाज़ा बन्द करके सो गई। फरीद जी सारी रात बैठे रहे सुबह हुई माँ ने दरवाज़ा खोलना चाहा दरवाज़ा खुले ही नहीं। दरवाज़ा बाहर की तरफ खुलता था। बाहर आँगन शक्कर से भरा पड़ा था और शक्कर दरवाज़े की झीरी में से कमरे में आने लगी थी। कठिनता से दरवाज़ा खोला। माँ ने देखा आँगन सारा ही शक्कर से भरा पड़ा है। बाबा फरीद जी समाधी से उठे तो माँ ने कहा मैने तो एक पाव शक्कर लाने को कहा था, इतनी सारी शक्कर क्या करनी थी। बाबा फरीद जी ने जवाब दिया माँ मैने तो अल्लाह से, परमात्मा से पाव के लिये ही कहा था, लेकिन मैं क्या करूँ भगवान का पाव ही बहुत बड़ा है। उसने तो अपने हिसाब से पाव ही दी होगी। परमात्मा का हम जीवों के साथ इतना प्यार है वह हमारी हर माँग को पूरा करता है इसलिये ये कहा है कि माता से हरि सौ गुणा। आगे वर्णन करते हैं। 
हरि से गुरु सौ बार।
ईश्वर के प्यार से सतगुरु का प्रेम अपने शिष्य से, प्रिय सेवक से, सौ गुणा अधिक होता है। सतगुरु का शिष्य से आत्मिक नाता है। सतगुरु शिष्य का आत्मिक पिता भी है माता भी है स्वयं ईश्वर भी और सतगुरु भी। सतगुरु में चारों रूप समाये हुये हैं। मात पिता सतगुरु मेरे शरण गहूं किसकी। गुरू बिन और न दूसरा आस करूँ जिसकी। सतगुरु पिता की तरह पालक और माता की तरह शिष्य की हर गल्तियों को नज़र अन्दाज़ करता है। इसलिये उन्हें सबसे अधिक प्रेम करने वाला कहा गया है। सतगुरु करूणा और प्रेम का स्वरूप हैं। सतगुरु को ईश्वर से सौ गुणा अधिक प्यार करने वाला इसलिये कहा है ईश्वर ने जीव की हर इच्छा को पूरा करना है चाहे वह उचित है या अनुचित। जीव की इच्छा चाहे माया की दलदल में फँसाने वाली है चाहे चौरासी में ले जाने वाली है या उसे नरक में ले जाने वाली है या उसे स्वर्ग तक पहुँचाने वाली है उसे ईश्वर ने पूरा करना है। उसे आप की अच्छी या बुरी माँग से कोई सरोकार नहीं। जो माँगोगे मिलेगा। क्योंकि वह हमारी स्वतन्त्रता में रूकावट नहीं डालता भले ही जीव कितना दुःखी और अशान्त हो, लेकिन सतगुरु का ह्मदय मक्खन से कोमल होता है।
श्रीरामायण में वर्णन हैः-      
         सन्त ह्मदय नवनीत समाना। कहा कविन्ह पर कहई न जाना।
         निज  प्रताप  द्रवहिं नवनीता। परहित द्रÏव्ह सो सन्त पुनीता।।
सतगुरु का ह्मदय मक्खन से भी कोमल होता है। मक्खन तो जब स्वयं को
सेक (गर्मी) पहुँचता है तो वह पिघलता है। लेकिन सन्तों का ह्मदय दूसरों के दुःख को देखकर  पिघल जाता है।

शनिवार, 19 मार्च 2016

दादूदयाल जी को गुरु ने चिताया


सन्तमहापुरुष जीव को जगायें तभी जीव जाग सकता है क्योंकि सारा संसार तो स्वंय सो रहा है सोया हआ किसी सोये को कैसे जगा सकता है? जागा हुआ ही सोये को जगा सकता है। सन्त महापुरुष जागे हुये होते हैं वे ही जीवों को जगा सकते हैं और जगाते हैं आवाज़ लगाते हैं।जो उनकी आवाज़ को सुनकर जाग जाते हैं वो अपना काम बना लेते हैं।
    सन्त दादू दयाल जी के जीवन गाथा में एक प्रसंग मिलता है जब सन्त दादू दयाल जी दूकान का कार्य करते थे एक बार उनके श्री गुरुमहाराज जी दूकान पर आये बाहर से आवाज़ लगाई।दादू।श्री दादूदयाल जी अपने बही खाते में व्यस्त थे।वर्षा हो रही थी वर्षा की आवाज़ की वजह से कुछ कार्य में व्यस्त रहने के कारण गुरुदेव द्वारा दी गई आवाज़ों को श्री दादूदयाल जी ने न सुना। कुछ देर गुरुदेव को इन्तज़ार करते बीत गई तो दादू दयाल जी ने थोड़ी देर बाद निगाह उठाई तो सामने गुरुदेव को पानी में भींगते हुए दुकान के बाहर खड़े पाया तो एकदम उठे दौड़कर दण्डवत वन्दना की। प्रार्थना करके अन्दर ले आये और क्षमा माँगने लगे।विनय की प्रभो आप अन्दर क्यों न आ गये?और न ही आवाज़ लगाई।आपको बाहर इन्तज़ार करना पड़ा आपको कष्ट हुआ इसके लिये क्षमा कर देना। गुरुदेव ने कहा- दादू।मुझे तो थोड़ी देर इन्तज़ार करनी पड़ी है और जो ईश्वर तेरी कईजन्मों से इन्तज़ार कर रहा है कि कब दादू जागे और मेरे पास आये।उस इन्तज़ार का क्या होगा? कहते हैं उसी समय सन्त दादूदयाल जी दुकान का कार्य छोड़कर प्रभु भजन भक्ति में लीन हो गये।जाग गये।सतपुरुष ही अपनी दया से जीवों को जगाते हैं वे जीव आप जैसे सौभाग्यशाली है जो महापुरुषों की शरण में आ गये हैं उनके सतसंग द्वारा उनके वचनों द्वारा जो जाग करके अपने निजी कार्य आत्मा के कल्याण में लग गये हैं और अपना जीवन सफल बना रहे हैं।
     हमारा सबका कर्तव्य है कि महापुरुषों के वचनों के अनुसार जो हमारे जीव कल्याण के लिये ये साधन बनाये हैं उनपर चलते हुए मोह की नींद को त्याग  कर जागकर अपना काम जो आत्म  कल्याण का निजी कार्य है श्री आरती पूजा सतसंग सेवा सुमरिण और भजन ध्यान करते हुये अपने जीवन को सफल बनाना है और परलोक भी सँवारना है।

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

मौत को सदा याद रखो


एक युवक एक सन्त जी के पास आता था।एक दिन उसने उनसे प्रश्न किया कि आपका जीवन ऐसा निर्मल है आपके जीवन की धारा ऐसी निर्दोष है कि कहीं कोई मलिनता नहीं दिखाई देती।आपका जीवन इतना पवित्र है, आपके जीवन में इतनी सात्विकता है इतनी शान्ति है लेकिन मेरा मन में यह प्रश्न उठता है कि कहीं यह सब ऊपर ही ऊपर तो नहीं, कहीं ऐसा तो नहीं कि भीतर मन में विकार भी चलते हों मन में वासनायें भी चलती हों भीतर पाप भी चलता हो भीतर अपिवत्रता, बुरार्इंया हों भीतरअन्धकार हो,अशान्ति हो,चिन्ता हो ऊपर से आपने सब व्यवस्था कर रखी हो। क्योकि मुझे भरोसा नहीं आता कि अदमी इतना शुद्ध कैसे हो सकता है मैने आपको सब तरफ से देखा और परखा है कहीं कोई भूल दिखाई नहीं पड़ती। हो सकता है मेरी खोज की सामथ्र्य आपकी छिपाने की सामथ्र्य से कम होगी ऐसा सन्देह मन में होता है कि आप में कहीं न कहीं भूल होनी चाहिए।
       सन्त जी ने कहा कि तुम्हारा प्रश्न का उत्तर तो मैं बाद में दूँगा। कई दिन से एक बात मैं तुझे कहना चाहता था लेकिन कह नहीं पाता था। वह ये कि कई दफे तेरा हाथ पर नज़र गई लेकिन में सोचता था अभी तो देर हैअभी क्यों तुझे मरने से पहले मार देना। लेकिन अब देर नहीं है अब सत्य को छिपाना उचित नहीं है। कल सुबह सूरज उगने के साथ ही तेरा अन्त हो जायेगा। इधर सूरज उगेगा, उधर तेरा सूरज डूब जायेगा। तेरी मौत की घड़ी करीब आ गई है।यह हमारा तुम्हारा आखरी मिलन है। अब मै तुझे कह के निश्चिन्त हुआ। तुझसे कह के मेरा बोझ हलका हो गया।अब तू पूछ क्या पूछना है?वह युवक प्रश्न पूछना भूल गया। जब अपनी मौत आ गई तो किस में दोष हैं किसमें दोष नहीं हैं किसको क्या प्रयोजन है? वह उठकर खड़ा हो गया उसने कहा कि मुझे अभी कोई प्रश्न नहीं सूझता।मुझे अब घर जाने दें। सन्त ने कहा।रूको भी इतनी जल्दी क्या है। कल सुबह कोअभी काफी देर है अभी तो दिन पड़ा है रात पड़ी है चौबीस घन्टे लगेंगे इतनी घबड़ाने की कोई ज़रूरत नहीं हैअपना प्रश्न तो पूछते जाओ फिर मैं उत्तर दे न पाऊंगा। क्योंकि कल तुम विदा हो जाओगे। युवक ने कहा रखो अपना उत्तर अपने पास मुझे कोई प्रश्न नहीं पूछना मुझे घर जाने दो।हाथ पैर उसके काँपने लगे। आया था  तो शरीर में  बल था जवानी थी लेकिन लौटते समय दीवार का सहारा लेकर चलने लगा।अचानक स्वास्थ्य खो गया।घर जाकर बिस्तर पर लग गया घर के लोगों ने कहा क्या हुआ है आज?कोई बिमारी है, कोई दुःख है कोई पीड़ा है,कोई चिन्ता है? उस युवक ने कहा न कोई बिमारी है न कोई दुःख लेकिन सब गया चिन्ता है भीतर एक कँपकपी है कल मर जाना है फकीर ने कहा है कि उम्र की रेखा कट गई है। घर के लोग रोने लगे। मोहल्ले पड़ोस के लोग एकत्र हो गये। वह युवक बुझी बुझी हालत में था। अब गया तब गया। तभी फकीर ने द्वार पर दस्तक दी कहा रोओ मत। मुझे भीतर आने दो।चुप हो जाओ।उस युवक को हिलाया कहाआँखें खोल उसने आँखें खोलीं। फकीर ने कहा तेरे सवाल का जवाब देने आया हूँ युवक ने कहा जवाब माँगता कौन है?फकीर ने कहा जो मैने यह तेरे हाथ की रेखा की बात कही है वह तेरा सवाल का जवाब है अभी तेरी मौत आई नहीं है। वह युवक यह सुनकर उठकर बैठ गया-तो मौत नहीं आ रही है ?फकीर ने कहा यह मज़ाक था सिर्फयह बताने को कि अगर मौत आती है तो आदमी के जीवन में पाप खो जाता है।चौबीस घन्टे में कोई पाप किया? किसी को दुःख पहुँचाया?किसी से झगड़ा किया?उस युवक ने कहा-दुःख की बात करते हैं। दुश्मनों से क्षमा माँग ली। सिवाय प्रार्थना के इन चौबीस घन्टों में कुछ नहीं किया। फकीर ने कहा जो पवित्रता मेरे जीवन में दिखाई देती है वह मौत के बोध के कारण है। तुझे चौबीस घन्टे बाद मौत दिखाई पड़ी मुझेचौबीस साल बाद दिखाई पड़ती है इससे क्या फर्क पड़ता है मौत सत्तर दिन बाद आयेगी कि सत्तर साल बाद आयेगी। जो आ रही है वहआ ही गई है।इस बोध ने मेरे जीवन को बदल दिया है।
मृत्यु का बोध जीवन को रूपान्तरित करता है जीवन को पुष्य कीगरिमा से भरता है जीवन को पवित्रता की सुवास से भरता है जीवन को पँख देता हैपरलोक जाने के लिये परमात्मा की खोज कीआकाँक्षा जगाता है।

गुरुवार, 17 मार्च 2016

सिकन्दर का अमृत कुण्ड तक पहुँचना


     सिकंदर उस जल की तलाश में था जिसे पीने से लोग अमर हो जाते हैं। बड़ी प्रसिद्ध कहानी है उसके सम्बन्ध में। अमृत की तलाश में था। कहते हैं कि दुनियाँ भर को जीतने का उसने जो आयोजन किया,द्म वह भी अमृत की तलाश के लिए। और कहानी है कि आखिर उसने वह जगह पा ली। वह उस गुफा में प्रवेश कर गया जहाँ अमृत का झरना है। आनन्दित हो गया।जन्मों जन्मों की जीवन की आकांक्षा की तृप्ति का क्षण आ गया। सामने  कल-कल नाद करता हुआ झरना है,इसी गुफा की तलाश थी। झुका ही था कि अंजलि में भर ले अमृत को और पी जाए, अमर हो जाए, कि एक कौवा बैठा हुआ था गुफा के भीतर। वह ज़ोर से बोला, ""ठहर,रुक। यह भूल मत करना।''सिकंदर ने कौवे की तरफ देखा। बड़ी दुर्गति की अवस्था में था कौवा। पहचानना मुश्किल था कि कौवा है, पंख झड़ गये थे, आँखें अन्धी हो गयीं थीं। ऐसा जीर्ण-शीर्ण उसने कौवा ही नहीं देखा था। बस, कंकाल था। सिकंदर ने पूछा रोकने का कारण? और रोकने वाला तू कौन? कौवे ने कहा, मेरी कहानी सुन लो। मैं भी अमृत की तलाश में था और यह गुफा मुझे भी मिल गयी थी, और मैने यह अमृत पी लिया। और अब मैं मर नहीं सकता। और अब मैं मरना चाहता हूँ। देखो मेरी हालत। आँखेंअन्धी हो गयी हैं, देह ज़राजीर्ण हो गयी है, पंख झड़ गये हैं, उड़ नहीं सकता, पैर गिर गये हैं, गल गये है, लेकिन मर नहीं सकता। एक बार मेरी तरफ देख लो। फिर तुम्हारी मर्ज़ी हो, तो अमृत पी लो। लेकिन अब में चिल्ला रहा हूं, चीख रहा हूं, कि कोई मुझे मार डाले, लेकिन मारा नहीं जा सकता। जी भी नहीं सकता क्योंकि जीने के सब उपकरण क्षीण हुए जा रहे हैं और मर भी नहीं सकता क्योंकि यह अमृत दिक्कत हो गया है। और अब प्रार्थना एक ही कर रहा हूँ परमात्मा से कि मुझे मार डालों, मुझे मार डालों। बस एक ही आकाँक्षा है किसी तरह मर जाऊं अब मर नहीं सकता। रूक जाओ, सोच लो एक दफा, फिर तुम्हारी मर्ज़ी।और कहते है सिकंदर सोचता रहा, और चुपचाप गुफा से बाहर वापिस लौट आया। उसने अमृत पिया नहीं।
     कौव्वा कौन था?मन था जिसके कहने पर आकर उसने गुरुदेव के वचनों पर विश्वास न रहा और मन रुपी कौव्वे के बहकावे में आकर अमृत पीने से वंचित रह गया। और दूसरी बात इस कथा में ये कि, तुम
जो भी चाहते हो अगर वह पूरा हो जाए तो भी तुम मुश्किल में पड़ोगे अगर वह पूरा न हो तो तुम मुश्किल में पड़ते हो। तुम मरना नहीं चाहते। अगर यह हो जाए, गुफा तुम्हें मिल जाए और तुम अमृत पी लो, तो तुम मुश्किल में पड़ोंगे। क्योंकि तब तुम पाओगे अब जी कर क्या करें?और जब जीवन तुम्हारे हाथ में था, जब तुम जी सकते थे, तब तुम आकांक्षा करते थे कि अमृत मिल जाए क्योंकि जब मृत्यु है, तो जियें कैसे?न मृत्यु के साथ जी सकते हो,न अमृत के साथ जी सकते हो। न गरीबी में जी सकते हो,न अमीरी में जी सकते हो। न नर्क में,न स्वर्ग में।और फिर भी तुम अपने को बुद्धिमान समझते हो।आदमी बिल्कुल बद्धिहीन है वह जो भी माँगता है उसी के जाल में भटकता है अगर पूरा हो जाता है, तो मुश्किल खड़ी हो जाती है।पूरा नहीं होता, तो मुश्किल खड़ी होती है। तुम सोच कर देखो, अतीत में लौटो अपनी ज़िन्दगी का एक दफा लेखा-जोखा करो। तुमने जो माँगा, उसमें से कुछ पूरा हुआ है उससे तुम्हें सुख मिला?तुमने जो माँगा उसमें से कुछ पूरा नहीं हुआ है, उससे तुम्हें सुख मिला?तुम दोनों हालत में दुःख पा रहे हो। जो माँगा है उससे उलझ गये, जो मिला है उससे उलझ गये जो नहीं मिला उससे उलझे हुए हो। बुद्धमानी क्या है? बुद्धिमत्ता का लक्षण क्या है? उस सूत्र को माँग लेना जिसे माँग लेने से फिर दुःख नहीं होता। इसलिए धार्मिक व्यक्ति के अतिरिक्त कोई बुद्धिमान नहीं है। क्योंकि परमात्मा को माँगने वाला ही पछताता नहीं। बाकी तुम जो भी माँगोगे, पछताओगे। इसे तुम गाँठ बाँध कर रख लो तुम जो भी माँगोगे,पछताओगे। सिर्फ परमात्मा को माँगने वाला कभी नहीं पछताता।
उससे कम में काम भी नहीं चलेगा। वही जीवन का गंतव्य है।