गुरुवार, 14 जुलाई 2016

अहंकार

एक दिन पानी से भरे कलश पर रखी हुई कटोरी ने उससे कहा," कलश, तुम बड़े उदार हो। तुम्हारे पास जो भी बर्तन आता है, उसे तुम पानी से भर देते हो, किसी को खाली नहीं जाने देते।' कलश ने उत्तर दिया," हाँ, मैं अपने पास आने वाले प्रत्येक पात्र को जल से भर देता हूँ, मेरे अंदर का सारा सार दूसरों के लिए है।' कटोरी बोली," लेकिन मुझे कभी नहीं भरते, जबकि मैं हर समय तुम्हारे सिर पर ही मौजूद रहती हूँ।' घड़े ने उत्तर दिया," इसमें मेरा कोई दोष नहीं, दोष तुम्हारे अभिमान का है। तुम अभिमानपूर्वक मेरे सिर पर चढ़ी रहती हो, जबकि अन्य पात्र मेरे पास आकर झुकते हैं और अपनी पात्रता सिद्ध करते हैं। तुम भी अभिमान छोड़कर मेरे सिर से उतरकर विनम्र बनो, मैं तुम्हें भी भर दूंगा।' पूर्णता की प्राप्ति, पात्रता एवं नम्रता से होती है, अभिमान एवं अहंकार से नहीं।

सोमवार, 11 जुलाई 2016

सन्त तुलसी दास जी

कहते है कि इंसान का मन भजन में तभी लगता है, जब उसके दिल में वैराग्य की भावना आती है। श्री गोस्वामी तुलसीदास जी, जिन्होंने रामायण की रचना की है, को भी वैराग्य हुआ। संसार जानता है कि जब उनका विवाह हुआ तो उनका अपनी स्त्री के साथ कितना मोह, प्यार और लगन थी।  इतने वासना के अधीन और स्त्री के वशीभूत जिस का प्रमाण संसार में बहुत कम मिलता है। लेकिन जब समय आ गया और पूर्व जन्मो के शुभ कर्म फल देने को आये तो संसार की मोह माया से दिल उखड़ने का कारण उसी स्त्री का एक वाक्य ही बना। स्त्री ने अपने प्रति उनके अत्यंत प्रेम को देखकर ये वचन कहे। ऐसा समझो कि प्रेरणा करने वाला मालिक उस स्त्री के मुँह से बोला-
दिग दिग दिग तोही प्राण प्यारे
हाड चाम अति नीरस हमारे
इतनी प्रीटी जी लगत रामे
तो सुधारे तेरे सब काम
नारी वचन शर सम हिये लागे
पूर्व सकल पुन्य तब जागे
तुलसीदास कहे मान गिलानी
है सत्य है सत्य तीय तव वाणी
शुकर शेत्र ग्यु पुनि सौगुरु कियो
तह अति मुद् मौरामायण अध्यातम पायो

स्त्री के वचन तुलसीदास जी को तीर के समान लगे। छाती फट गई और अपने आप को धिक्कारते हुए स्त्री से बोले- प्रिय। तेरी वाणी सत्य है। मैं सचमुच मूर्ख हूँ, जो भगवान की भक्ति से विमुख होकर माया के पीछे अंधा हो रहा हूँ। बस तेरा और मेरा यह अंतिम मिलाप था जो मेरे लिए शिक्षादायक बना, अब मैं जाता हूँ। ठोकर लगते ही कुरुक्षेत्र को गए, वहाँ पर गुरु का मिलाप हुआ। तब गुरु की अत्यंत श्रद्धा सहित सेवा कर के अध्यात्म रामायण अर्थात रूहानी उपदेश प्राप्त किया और भजनाभ्यास कर के उच्चकोटि के संतो की श्रेणी पर जा पहुँचे। जब अन्तर्मन की आँख खुली तो त्रेतायुग की भगवान श्री राम जी की कथायें और लीलाये ज्यो की त्यों कलियुग के अंदर श्री रामचरितमानस के रूप में लिख दी जिसके सामने आज लोग श्रद्धा भक्ति से सिर झुकाते और प्यार करते हैं।

शनिवार, 9 जुलाई 2016

काक भुशुण्ड

काक भुशुण्ड जी ने गरूड को अपनी पिछले जन्मो की कथा सुनाई कि एक बार मैं शिवजी के मन्दिर में बैठकर शिवजी की उपासना कर रहा था उसी अवसर में गुरु महाराज भी आ गये किन्तु मैंने अभिमान वश उठकर उनको प्रणाम न किया। विचार यह था कि इस समय तो मै शिवजी के मंदिर में बैठकर तप करता हूँ। इस समय गुरु को प्रणाम करने की क्या आवश्यकता है। गुरुमहाराज जी तो बड़े दयालु थे। उन्होंने तो कुछ न कहा और न ही उन के हृदय में क्रोध आया। परन्तु हे गरूड जी। गुरु का निरादर करना तो महाघोर पाप है उसको शिवजी महाराज सहन न कर सके। क्रोध से भरी हुई मंदिर से आकाश वाणी उतरी। सो मंदिर में से यह आकाशवाणी हुई- अरे हतभाग्य नीच अभिमानी। यधपि तेरे गुरु को कुछ भी क्रोध नहीं उपजा क्योंकि वे दयामय सन्त है और पूर्ण ज्ञानी है। हे मुर्ख। तदपि मै तुझको शाप देता हूँ। क्योंकि नीति के विरुद्ध चलने वाला मुझे अच्छा नहीं लगता। रे दुष्ट! जो मै तुम को दण्ड नहीं दूंगा तो मेरा नीति का मार्ग भ्रष्ट हो जाएगा क्योंकि गुरु का अपमान करना वेद शास्त्रों की नीति के विरुद्ध बात है। इसलिए वेद की नीति की रक्षा के लिए मैं तुझे अवश्य शाप दूंगा। उस आकाशवाणी में यह वचन भी हुआ कि जो मुर्ख गुरु के साथ ईर्ष्या करते है वे सौ कल्प तक रोख नामक आग में जलते है। तत्पश्चात हजार जन्म तक नीच योनियों के अन्दर जाकर महाकष्ट सहन करते है। रे पापी। तू गुरु को आते देखकर अजगर की भांति जमकर बैठा रहा। इस कारण मेरा शाप है कि तू अजगर हो जा। अरे दुष्ट। तेरी बुद्धि में पाप समा गया है, इसलिए तू सर्प योनि की महान नीच गति को पाकर किसी बड़े पुराने पेड़ की जड़ के नीचे भयानक अँधेरी खोड में जाकर निवास कर। शिवजी का ऐसा कठिन शाप सुनकर गुरु महाराज सहन न कर सके और हाहाकार करके तथा मन में अति दुखित होकर शिवजी के मंदिर में जाकर उन्होंने प्रार्थना की कि हे देवो के देव।
 कलियुग के जीव मन माया के अधीन सदा भूलते है। इन पर दया होनी चाहिये और भूल चूक को श्रमा कर देना चाहिये और साथ ही गुरु महाराज ने शिवजी की स्तुति भी की। तब मंदिर से फिर आवाज आई- ऐ परोपकारी महात्मन। यधपि आपके शिष्य ने दारूण पाप किया है और मंदिर से फिर आवाज आई- ऐ परोपकारी महात्मन। यधपि आपके शिष्य ने दारूण पाप किया है और मैंने भी क्रोध करके शाप दिया है तदपि आपके दयामय, परोपकारी, साधु स्वभाव को देख कर इस पर विशेष कृपा करता हूँ। ऐ महात्मन, मेरा शाप तो व्यर्थ जा नहीं सकता। हजार जन्म तो यह अवश्य पायेगा, किन्तु जन्मते और मरते समय जो जीव को अत्यंत दुःख होता है, वह दुःख इसको विचिन्तमात्र भी नहीं व्यपेगा। ऐ परोपकारी महापुरुष। दूसरी कृपा इस पर यह करता हूँ कि जिस जन्म में यह जायेगा किसी भी जन्म में इस का ज्ञान नहीं मिटेगा। अपने सारे जन्मो की इस को सुधि रहेगी। तीसरी कृपा में यह करता हूँ कि अन्त में इसे भगवान की भक्ति प्राप्त होगी।।

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

गरुड़ जी ने कागभुसुंडि जी से सात प्रश्न पूछे।


प्रथम- सृष्टि के अंदर जड़ तथा चेतन जितने भी जीव है, सब से दुर्लभ शरीर कौन-सा है?
उत्तर- मनुष्य देह के समान दूसरी कोई देह नहीं है। चर अथवा अचर अर्थात चलने फिरने और न चलने वाले, जड़ व चैतन सृष्टि के अंदर जितने भी जीव है, सब इस देह की याचना करते है।
दूसरा – इस संसार मैं सब से बड़ा दुःख क्या है?
उत्तर- संसार में दरिद्रता के समान दूसरा कोई दुःख नहीं है।
तीसरा– इस संसार में सबसे बड़ा सुख क्या है?
उत्तर- संतो के मिलने के समान दूसरा कोई सुख नहीं है।
यहाँ पर प्रश्न उठता है कि दरिद्रता कंगालपन को कहते है धनहीन को। तो यह धन की हीनता माया का धन है या भक्ति का धन? उत्तर साफ़ है यह भक्ति का धन है- जिसके बिना मनुष्य कंगाल और दुखी है। क्योंकि जब यह कहा गया कि संतो के मिलाप के समान दूसरा कोई सुख नहीं है तो फिर यह बात सिद्ध हो जाती है कि भक्ति से हीन होने के बराबर दूसरा कोई दुःख भी नहीं है। किन्तु जब संत मिलते है तो अपनी भक्ति का धन देकर सुखी कर देते है क्योंकि संतो के पास  भक्ति ही का धन होता है।
चौथा – संत सत्पुरुषो तथा दुष्ट पुरुषों का सहज स्वभाव वर्णन कीजिये।
उत्तर- मन वचन और कर्म से उपकार करना संतो का सहज स्वभाव है। यहाँ तक कि संत दूसरे के हित के निमित्त अपने ऊपर दुःख भी सहते है, जैसे भोज पत्र का वृक्ष दूसरों को सुख देने के निमित अपनी खाल खिचवाता है (भोज परत के वृक्ष की खाल उतार कर ऋषि मुनि और तपस्वी लोग अपने शरीर को ढ़कते थे)। तात्पर्य यह है कि संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहन करते है तथा खोटे पुरुष दूसरों की बुराई के निमित दुःख सहते है। दुष्ट पुरुष बिना प्रयोजन ही दूसरों की बुराई करते है, जैसे साँप काट लेता है, तो उसको कुछ लाभ नहीं होता पर दूसरों के प्राण चले जाते है। चूहा बहुमूल्य वस्त्रों को काट डालता है, दूसरों की हानि हो जाती है परन्तु उसका कुछ लाभ नहीं होता। फिर कहते है जैसे बर्फ के ओले खेती का नाश करके आप नष्ट हो जाते है, ऐसे ही दुष्ट जन दूसरो की सम्पदा का नाश करके आप भी नष्ट हो जाते है।
पांचवा – वेदों ने कौन-सा सबसे बड़ा पुण्य बताया है?
उत्तर- वेदों में सबसे बड़ा पुण्य अर्थात परम धर्म अहिंसा कहा गया है। अर्थात किसी की आत्मा को न ही दुखाना अहिंसा है।
छठा – सबसे घोर पाप कौन-सा है
उत्तर-परायी निंदा के समान कोई बड़ा पाप नहीं है कागभुसुंडि जी का कथन है कि भगवान और गुरु की निंदा करने वाले मेंढ़क की योनि में जाते हैं और हजार जन्म तक मेंडक ही बनते रहते है तथा संतो की निंदा करने वाले उल्लू की योनि में जाते है। जिनको मोह रुपी रात्रि प्यारी है परन्तु ज्ञान रूपी सूर्य नहीं भाता अथवा जो मुर्ख सब की निंदा करते है, वे दूसरे जन्म में चमगादड़ बनते है
सातँवा – मानसिक रोग कौन-२ से है?
उत्तर- अब मन के रोग सुनिए, जिन से सब लोग दुःख पाते है। सम्पूर्ण व्याधियो अर्थात रोगों की मूल जड़ मोह है। इस मोह से फिर अनेक प्रकार के शूल उत्पन्न होते है यदि मोह की जड़ कट जाए तो फिर शांति ही शांति है ।

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

इच्छा

एक गरीब व्यक्ति एक महात्मा के पास गया और बोला, 'महाराज, मेरा अधिकतर जीवन गरीबी में गुजर गया। मैं भी वैभव व अमीरी में जीवन गुजारना चाहता हूं। कृपया मेरी मदद करें।' व्यक्ति की बात सुनकर महात्मा मुस्करा दिए और बोले, 'कल तुम इसी समय मेरे पास आना और अपनी कोई भी एक इच्छा बताना। मैं उसे अवश्य पूरा कर दूंगा।' यह सुनकर व्यक्ति खुश होते हुए अपनी झोपड़ी में आ गया।
रात भर वह विचार करता रहा कि मैं महात्मा से कौन सी इच्छा पूरी करने को कहूं? कभी वह सोचता कि वह महात्मा से कहेगा कि वह उसकी महल में रहने की इच्छा पूरी कर दें। महल में रहने से वह खुद ही सेठ बन जाएगा। फिर उसने सोचा, नहीं खाली महल से तो काम नहीं चलेगा। इससे अच्छा तो वह राजा बन जाए। राजा बनकर वह सब पर शासन करेगा और उसे धन-धान्य किसी भी बात की कोई कमी नहीं रहेगी। किंतु तभी उसके मन में विचार आया कि राजा तो स्वयं प्रजा पर आश्रित होता है।
यदि उसे प्रजा पसंद न करे तो वह रातोंरात जमीन पर आ जाता है। इसी उधेड़बुन में सुबह हो गई। सुबह वह महात्मा के पास पहुंचा। महात्मा उसे देखकर मुस्कराते हुए बोले, 'हां भाई, बोलो, तुम्हारी कौन सी इच्छा पूरी की जाए?'
महात्मा की बात सुनकर वह व्यक्ति बोला, 'महाराज, रात भर मैं इसी उधेड़बुन में लगा रहा कि कौन सी इच्छा पूरी करूं? लेकिन मुझे लगा कि एक इच्छा अनेक इच्छाओं को जन्म दे देती है। इसलिए सबसे अच्छी व मन को संतोष देने वाली इच्छा तो आत्मसंतुष्टि है। इसलिए आप मेरी यही इच्छा पूरी कर दीजिए कि मेरे अंदर आत्मसंतोष रहे और कभी भी असंतोष की भावना मुझे गलत मार्ग पर चलने को प्रेरित न करे।' व्यक्ति की बात सुनकर महात्मा मुस्करा कर बोले, 'तथास्तु।' इसके बाद वह व्यक्ति संतुष्ट होकर अपने घर चला गया और मेहनत-मजदूरी करके अपना जीवन बिताने लगा ।

रविवार, 3 जुलाई 2016

इन्द्र का भ्रम

भरत जी की भगवान के चरणों मे इस प्रकार गहरी श्रद्धा, भक्ति देख कर स्वर्ग के राजा इंद्र को चिंता हुई क्योकि यह जगत भले मानुष को भला और नीच को नीच दिखाई देता हैप्र् इंद्र ने सोचा यदि भगवान भरत जी का इस प्रकार प्रेम देखेंगे तो अवश्य ही अयोध्या को लौट जायेंगेप्र् और अगर भगवान वापस अयोध्या को लौट गए तो हमारा कारज वहीं का वहीं रह जायेगाप्र् यह सोचकर इंद्र ब्रहस्पति जी से प्राथना करने लगे, ‘हे गुरुदेव! कोई उपाय किया जाये जिससे भगवान और भरत का मिलाप ना हो सकेप्र् भगवान तो प्रेम के संकोची है अर्थात प्रेम के वश है और भरत जी प्रेम के समुन्द्र है, मालूम ऐसा होता है कि बनी बात बिगडना चाहती हैप्र् अब कोई छल-कपट का उपाय करना चाहिए जिससे भगवान वापस अयोध्या को न लौट पायेंप्र्’ गुरु ब्रहस्पति जी प्रभु भक्ति की महिमा को समझते है, इंद्र का स्वार्थ से भरा हुआ वचन सुनकर मन-ही-मन में हंसे और हजार नेत्र वाले इंद्र को बिना नेत्र के यानि अंधा जानाप्र् ब्रहस्पति जी ने कहा, ‘हे इंद्रप्र् दिल से मिथ्या भ्रम को निकाल दो और छल-कपट को छोड दो, यहाँ छल-कपट करोगे तो भांडा फूट जायेगा अर्थात छल प्रकट हो जायेगा और हानि होगीप्र् हे स्वर्ग के राजा इंद्र, माया पति भगवान के सेवक से माया का छल कपट करने पर वह माया उसी करने वाले के सिर पर पलट पड़ती हैप्र् तब (बनवास के निमित) जो कुछ किया गया वह भगवान की इच्छा जान कर किया गया परन्तु अब कुछ भी करने से हानि होगीप्र्’
इतिहास बताता है जब भगवान श्री राम जी को अयोध्या मे राज्य तिलक करने की तैयारी हो रही थी, तब देवताओं के राजा इंद्र को चिंता हुई कि यदि भगवान राजगद्दी पर बैठ गए तो राक्षसों के नाश का कारज नहीं होगाप्र् ऐसा विचार कर उसने एक चाल चली और सरस्वती को इशारा दियाप्र् उसने रानी कैकेयी की दासी मंथरा की जबान द्वारा रानी कैकेयी को प्रेरित किया कि वह इस अवसर पर राजा दशरथ से दो वर मांगे, एक तो राम को चौदह वर्ष का बनवास और दूसरा उसके बेटे भरत को अयोध्या का राजा बनाया जायेप्र् यह चाल सफल हो गई थी और इंद्र का साहस बढ़ गया थाप्र् अब यहाँ तो बात दूसरी हैप्र् भरत और राम के बीच मे  प्रेम भक्ति का सम्बन्ध है, स्वामी और सेवक का पुराना नाता है, इंद्र इस नाते को जानता नहीं, उसकी आँखों पर स्वार्थ की पट्टी बंधी हैप्र् वह नहीं देख पा रहा कि भगवान को अपने भक्तो से किस कदर प्यार होता हैप्र् इसी कारण उसके जवाब मे ब्रहस्पति जी ने उसे हजार नेत्र रखते हुए भी अंधा कहा और सत्य ही है जिसके पास भक्ति व परमार्थ की आँख नही है वह अंधा ही होता है ब्रहस्पति जी ने कहा, “ हे इंद्र, बनवास के समय तेरी कपट की चाल चल गई थी तो उसमे भगवान की अपनी मर्जी थीप्र् उस समय जो कुछ किया गया था, उनकी मर्जी से ही हुआ थाप्र् परन्तु फिर आगे चलकर ब्रहस्पति जी इंद्र को उपदेश करते है

सुन सुरेश रघुनाथ सुभाऊ
निज अपराध रिसाहि न काउ
जो अपराध भक्त कर करहि
राम रोष पावक सो जरहि

‘हे इंद्र, भगवान का स्वभाव सुनोप्र् वह अपने अपमान से किसी पर कोप नहीं करते अर्थात उनका अपना कोई अपमान कर देता है तो वह परवाह नहीं करतेप्र् परन्तु जो उनके भक्त का अपमान करता है वह भगवान के क्रोध की अग्नि मे जरुर जलता हैप्र् भक्तो और संतो के अपराधी को ईश्वरीय नियम के अधीन अवश्य ही दंड भुगतना पड़ता है, उससे उसे कोई नहीं बचा सकताप्र् हे इंद्रप्र् भरत के समान भगवान का प्यारा कौन हैप्र् संसार तो भगवान का नाम जपता है और स्वयं भगवान उनका (भरत जी का) नाम जपते हैप्र् हे अमरपति(देवराज इंद्र) भगवान के भक्त का अकाज मन मे न लाइए अर्थात भक्त के अकाज की मन मे चितवन भी न कीजिए, नहीं तो इस लोक मे अपयश और परलोक मे दुखी होगे और दिन- प्रतिदिन शोक संताप बढ़ते जायेंगेप्र् आगे फिर कहते है
           
                सुन सुरेश उपदेश हमारा
रामहि सेवक परम प्यारा
मानत सुख सेवक सेवकाई
सेवक वैर वैर अधिकाई

‘हे इंद्र, हमारा उपदेश सुनोप्र्  भगवान को अपना सेवक बहुत ही प्यारा हैप्र् उनके सेवक की जो सेवा करता है, उसे सुख और उससे वैर करने से दुःख मिलता हैप्र्’ ब्रहस्पति जी की सुंदर बाते सुन कर इंद्र को ज्ञान हुआ और मन की ग्लानि मिट गईप्र् तब सुरराज इंद्र भी प्रसन्नता से फूल बरसाकर भरत जी के स्वभाव की बढ़ाई करने लगे।

मंगलवार, 28 जून 2016

भक्ति की रक्षा

एक छोटे से गाँव में रहने वाले मुर्गे को अपनी आवाज़ पर बड़ा नाज था। एक दिन एक चालाक लोमड़ी उसके पास आई और बोली, "मुर्गे महाशय! सुना है, आपकी आवाज़ बड़ी प्यारी और बुलंद है।' मुरगे ने गद्गद् होकर अपनी आँखें मीचीं और ऊँची आवाज़ में चिल्लाया-कु कुकुड़ूँ--कूँ! कु कुकुड़ूँ--कूँ! पर तभी लोमड़ी ने फुरती से उसे अपने मुँह में दबोच लिया और जंगल की तरफ भाग चली। गाँव वालों की नज़र उस पर पड़ी तो वे चिल्लाए,"पकड़ो, मारो! यह तो हमारा मुरगा दबोचे लिये जा रही है।' लोमड़ी ने उनकी चिल्लाहट पर ध्यान नहीं दिया। यह देखकर मुरगा बोला,"लोमड़ी बहन, ये गाँववाले चिल्ला रहे हैं कि मेरा मुरगा दबोचे लिये जा रही है। आप इन्हें जवाब क्यों नहीं दे देतीं कि यह मुर्गा आपका है, उनका नहीं?' लोमड़ी को मुरगे की बात जम गई। उसने फौरन मुँह खोला और गाँव वालों की ओर देखकर कहा,"भूल जाओ अपने मुरगे को। यह तो अब मेरा निवाला है।' पर यह कहने के साथ जैसे ही लोमड़ी का मुंह खुला, मुरगा उसके मुँह से छूट गया। वह सरपट भागा और गाँववालों के पास पहुँच गया।
      जब आदमी अपने अहंकार में फूला फिरता है और किसी के द्वारा प्रशंसा सुन कर फूल कर कुप्पा हो जाता है तो समझो वह काल के मुँह का निवाला बन जाता है। जैसे कि मुरगा अपनी प्रशंसा सुनकर फूला नहीं समाया और लोमड़ी के मुँह का निवाला बन बैठा। दूसरी शिक्षा इस दृष्टान्त से यह मिलती है कि अगर कोई अपनी भक्ति की कमाई को पाकर उसे छुपा कर नहीं रखता अर्थात् अपनी सिद्धियों का बखान करता है तो उसके हाथ में आई हुई भक्ति की सम्पदा छूट जाती है। जैसे लोमड़ी के मुंह आया हुआ मुरगा पाकर भी मौन न रह सकी, और अपने नि़वाले से हाथ धो बैठी।